Tuesday, April 8, 2014

तुलसीदास की कविताई का अपना महत्व है।अगर भक्तिकाल हिंदी साहित्य का स्वर्ण-युग है तो रामचरितमानस हिंदी मध्यकाल के भाषाई दुर्ग पर गढ़ित दूर से ही चमकता एक स्वर्ण-क्लश है। रामचरितमानस के साष्टांग रूपकत्व की चर्चा पूरे विश्व में की जाती है। राम के नायकत्व को तुलसी ने अपनी पूरी विनयशीलता के साथ प्रस्तुत किया है। किसी कवि के लिए यह बड़ी बात है कि उसके लिखे शब्द लोगों के लिए प्रार्थना  के बोल बन जाएं।   
इन पंक्तियों में राम के जन्म को किस विह्वलता और सहजता के साथ प्रस्तुत किया गया है!उनके जन्म के समय ही उनके चरित-नायकत्व को मानों स्थापित कर दिया गया हो!.... कौशल्या राम से अपने विराट रूप को तजकर शिशु रूप में आने की विनती कर रही हैं।मानों किसी स्त्री ने किसी देव को अपना शिशु बनाने का संकल्प साधा हो।  

माता पुनि बोली, सो मति डोली,तजहु तात ये रूपा
कीजै सिसु लीला,अति प्रिय सीला, यह सुख परम अनुपा 
सुनी वचन सुजाना, रोदन ठाना, होई बालक सुरभूपा..

Thursday, December 27, 2012






 


मेरे  द्वारा खींचा गए  चित्र इन पुस्तकों के आवरण पर हैं। कृपया अपनी प्रतिक्रिया दें।

Friday, September 21, 2012

                                                           
     नदी
  
अर्पण कुमार


जटिल नहीं है
नदी की
चक्करदार,बिछलती देह
जटिल है
उसकी गोपन भाषा


मुश्किल नहीं है
नदी की केशराशि फैलाना
मुश्किल है
अपनी अधीर उँगलियों से
उसकी वेणी बनाना
धैर्यपूर्वक

पुरुषार्थ नहीं है
नदी को हासिल करना
पुरुषार्थ  है
नदी के साथ बहना
सँभालते हुए उसे
उबड़-खाबड़ पथ पर
होकर आत्मसंयत स्वयं भी

जरूरी नहीं है
नदी को चाँद कहना
जरूरी है
नदी में चाँद की तरह उतरना
गहरे,अनछुए,लिप्सारहित....
नहाते हुए
उसके जल को
अपनी रोशनी में

भ्रम नहीं है
नदी का दर्पण होना
भ्रम है 
उसमें बेमानी
अपना कोई प्रतिबिंब देखना
जिद में और बहुधा
झूठी शान में

दुष्कर नहीं है
नदी को समझना
दुष्कर है
उसे विश्वास में लेना
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Wednesday, September 19, 2012

'जानवरों को कविता की जरूरत नहीं होती।' रामचंद्र शुक्ल

आचार्य रामचंद्र शुक्ल के प्रसिद्ध निबंध 'कविता क्या है?' का अंतिम खंड.....

कविता की आवश्यकता

मनुष्य के लिए कविता इतनी प्रयोजनीय  वस्तु है कि संसार की सभ्य-असभ्य सभी जातियों में,किसी न किसी रूप में, पाई जाती है।  चाहे इतिहास न हो,विज्ञान न हो,दर्शन न हो,पर कविता  का प्रचार अवश्य  रहेगा।बात यह है कि मनुष्य अपने ही व्यापारों का ऐसा सघन और जटिल मंडल बाँधता  चला आ रहा  है जिसके भीतर बँधा-बँधा वह शेष सृष्टि के साथ अपने हृदय का संबंध भूला-सा  रहता है। इस परिस्थिति में मनुष्य को अपनी मनुष्यता खोने का डर  बराबर रहता है। इसी से अंतःप्रकृति में मनुष्यता  को समय-समय पर जगाते रहने के लिए कविता मनुष्य जाति के साथ लगी चली  आ रही है और चली रहेगी। जानवरों  को इसकी जरूरत नहीं।